भीलवाड़ा, राजस्थान: राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में एक पिता की कुंठा और सामाजिक मान-मर्यादा ने एक चौंकाने वाला रूप ले लिया। अपनी बेटी के अंतरजातीय प्रेम विवाह कर लेने पर पिता ने बेटी को “मर गई” मानते हुए शोक-पत्रिका छपवा दी और मृत्युभोज (तीया और ब्रह्मभोज) का कार्यक्रम तय कर दिया। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद आखिरकार पिता को यह कार्यक्रम रद्द करना पड़ा।
क्या था पूरा मामला?
आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, शक्करगढ़ थाना क्षेत्र के आमल्दा गांव के रहने वाले देवेंद्र सिंह कानावत ने अपनी बेटी को पढ़ाई के लिए जयपुर भेजा था। परिवार को उम्मीद थी कि बेटी पढ़-लिखकर परिवार का नाम रोशन करेगी। लेकिन बेटी ने जयपुर में पढ़ते हुए दूसरे समाज के एक युवक से प्रेम विवाह कर लिया।
जब दोनों को पुलिस थाने लेकर आई, तब पिता ने बेटी को बहुत समझाया। उन्होंने बेटी के सामने हाथ जोड़कर, झोली फैलाकर मिन्नतें कीं कि घर लौट आए, लेकिन बेटी अपने फैसले पर अडिग रही। युवती ने साफ कहा कि वह अपने चुने हुए जीवनसाथी के साथ रहना चाहती है और दोनों ने पुलिस से सुरक्षा की मांग भी की।
पिता ने छपवा दी शोक-पत्रिका
बेटी के फैसले से टूटे देवेंद्र सिंह कानावत ने बेटी को “मर गई” मान लिया। उन्होंने शोक संदेश छपवाया और 22 मार्च को तीये की बैठक तथा 31 मार्च को ब्रह्मभोज (मृत्युभोज) का कार्यक्रम घोषित कर दिया। पूरे गांव में शोक की खबर फैल गई।
पुलिस ने रोका मृत्युभोज
मामले की गंभीरता को देखते हुए भीलवाड़ा के एसपी धर्मेंद्र सिंह ने तुरंत हस्तक्षेप किया। उन्होंने पिता देवेंद्र सिंह को सख्त निर्देश दिए कि वे मृत्युभोज या कोई शोक बैठक नहीं रख सकते। एसपी के निर्देश पर शक्करगढ़ थाने में पिता के खिलाफ निरोधात्मक कार्रवाई भी की गई। इसके बाद पिता ने मृत्युभोज और बैठक का कार्यक्रम रद्द कर दिया।
पिता की वेदना
देवेंद्र सिंह कानावत ने कहा कि यह एक दुखी पिता की वेदना है। उन्होंने बताया कि जिस क्षत्रिय कुल में उनका जन्म हुआ है, उसकी मान-मर्यादा को देखते हुए उन्होंने यह कदम उठाया। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे मोबाइल की लत से बाहर निकलें, अच्छा ज्ञान प्राप्त करें और माता-पिता का सम्मान बनाए रखें।
समाज में छिड़ी बहस
ग्रामीण शिवराज मीणा ने कहा कि यह समस्या केवल आमल्दा गांव की नहीं, बल्कि पूरे देश के कई गांवों में देखी जा रही है। माता-पिता बड़ी उम्मीदों के साथ बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन कई बार युवा गलत रास्ता चुन लेते हैं।
परिजनों ने कहा कि उन्हें संविधान से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन समाज के कुछ सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्य भी हैं, जिन्हें बचाना जरूरी है। उनका मानना है कि माता-पिता की सहमति के बिना ऐसे विवाहों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
यह पूरा मामला अब क्षेत्र में चर्चा का मुख्य विषय बन गया है। एक तरफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ पारंपरिक सामाजिक मूल्यों और माता-पिता की भावनाओं को लेकर गहरी बहस छिड़ गई है।
पुलिस ने स्थिति को शांत रखने के लिए सतर्कता बरती हुई है और दोनों पक्षों से बातचीत जारी है।

