इलाहाबाद हाईकोर्ट: ‘सार्वजनिक जमीन पर नमाज पढ़ने की अनुमति नहीं’, याचिका खारिज, कोर्ट ने दी सख्त चेतावनी

Allahabad High Court News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सार्वजनिक भूमि पर नमाज पढ़ने की अनुमति देने वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सार्वजनिक जमीन पर किसी एक समुदाय द्वारा धार्मिक गतिविधियाँ नहीं की जा सकतीं। सभी नागरिकों का इस पर समान अधिकार है।

Samvadika Desk
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इलाहाबाद हाई कोर्ट
Highlights
  • सार्वजनिक जमीन पर नमाज पढ़ने की अनुमति नहीं – हाईकोर्ट!
  • सभी नागरिकों का समान अधिकार, किसी एक समुदाय का नहीं!
  • यदि बैनामा गलत तरीके से हुआ तो अवैध माना जाएगा!

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सार्वजनिक भूमि पर नमाज पढ़ने को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि सार्वजनिक जमीन पर किसी एक समुदाय द्वारा धार्मिक गतिविधियाँ करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सभी नागरिकों का इस पर समान अधिकार है। हाईकोर्ट ने संभल जिले के गुन्नौर तहसील के इकौना निवासी असीन की याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने 23 सितंबर 2025 को यह फैसला सुनाया।

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याचिका में क्या माँग की गई थी?

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, असीन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सार्वजनिक भूमि पर नमाज पढ़ने की अनुमति माँगी थी। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि सार्वजनिक भूमि का एकतरफा उपयोग कानूनन स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी जमीन पर किसी एक पक्ष द्वारा धार्मिक गतिविधियाँ नहीं की जा सकतीं।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

खंडपीठ ने कहा कि पूर्व के फैसलों में निजी परिसरों के भीतर सद्भावनापूर्ण प्रार्थना की रक्षा की गई थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि निजी परिसरों को अनियंत्रित सामूहिक स्थान में बदला जा सकता है। जहाँ गतिविधि सार्वजनिक क्षेत्र को प्रभावित करने लगे, वहाँ वैध विनियमन लागू होता है। कोर्ट ने कहा कि धर्म का पालन करने का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है और इसका प्रयोग इस तरह नहीं किया जा सकता कि यह दूसरों के अधिकारों में हस्तक्षेप करे।

निजी भूमि पर भी नहीं मिली छूट

कोर्ट ने कहा कि यदि भूमि को निजी मान भी लिया जाए, तो भी याचिकाकर्ता माँगी गई राहत का हकदार नहीं है। सुनवाई में कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता किसी मौजूदा प्रथा की रक्षा नहीं कर रहा है, बल्कि गांव के भीतर और बाहर के व्यक्तियों को शामिल करते हुए नियमित सामूहिक सभाओं को शुरू करने की माँग कर रहा है।

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सीमित उपयोग पर जोर

कोर्ट ने कहा कि पहले नमाज केवल ईद जैसे विशिष्ट अवसरों पर ही अदा की जाती थी। सीमित निजी क्षेत्र से परे यह विस्तार संरक्षित क्षेत्र से बाहर आता है और विनियमन के अधीन है। परंपरा से इतर गतिविधियों पर राज्य को हस्तक्षेप का अधिकार है। किसी भी व्यक्ति या समूह की धार्मिक स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है, बल्कि यह अन्य व्यक्तियों के अधिकारों और स्वतंत्रता पर भी निर्भर करती है।

यदि बैनामा गलत तरीके से हुआ तो अवैध

कोर्ट ने कहा कि यदि सार्वजनिक भूमि का गलत तरीके से अंतरण (बैनामा) कर भीड़ इकट्ठा कर नमाज पढ़ने की माँग की जाती है, तो ऐसा बैनामा अवैध माना जाएगा। कोर्ट ने साफ किया कि सार्वजनिक भूमि का उपयोग सभी के लिए समान होना चाहिए और किसी एक समुदाय द्वारा इसका एकतरफा कब्जा नहीं किया जा सकता।

संभल में चर्चा

यह फैसला संभल जिले में धार्मिक गतिविधियों और सार्वजनिक भूमि के उपयोग को लेकर नया संदेश दे रहा है। स्थानीय स्तर पर लोग इस फैसले पर चर्चा कर रहे हैं। कुछ इसे सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का कदम बता रहे हैं, तो कुछ इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर अंकुश मान रहे हैं। हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए नजीर बन सकता है।

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