प्रयागराज, उत्तरप्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक महत्वपूर्ण और चर्चित फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ अपनी मर्जी से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा। ऐसे में उसकी गिरफ्तारी नहीं हो सकती और उसके खिलाफ मुकदमा भी नहीं चल सकता।
क्या था पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला शाहजहांपुर के जैतीपुर थाना क्षेत्र के एक मामले में सुनाया गया। अनामिका नाम की युवती की मां कांति ने 8 जनवरी 2026 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि नेत्रपाल उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है। पुलिस ने इस आधार पर नेत्रपाल के खिलाफ बीएनएस की धारा 87 (अपहरण) के तहत केस दर्ज कर लिया।
लेकिन जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो अनामिका ने खुद अदालत में बयान दिया कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से नेत्रपाल के साथ रह रही है। दिलचस्प बात यह रही कि शिकायतकर्ता मां की एफआईआर में भी अनामिका की उम्र 18 साल लिखी हुई थी, जिससे साफ हो गया कि वह नाबालिग नहीं है।
दूसरे पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि नेत्रपाल पहले से शादीशुदा है, इसलिए उसका किसी दूसरी महिला के साथ रहना गलत है। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि अगर दो बालिग व्यक्ति अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, तो इसे अपराध नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने SP को ठहराया जिम्मेदार
कोर्ट ने सुरक्षा के मुद्दे पर भी सख्त रुख अपनाया। उसने स्पष्ट आदेश दिया कि इस जोड़े की सुरक्षा की जिम्मेदारी शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) की होगी। कोर्ट ने कहा कि पुलिस यह सुनिश्चित करे कि दोनों को कोई नुकसान न पहुंचे।
अदालत ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही 2018 के ‘शक्ति वाहिनी’ मामले में ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश दे चुका है।
क्या होगा आगे?
कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को आदेश दिया कि इस फैसले की जानकारी 24 घंटे के अंदर शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक और जैतीपुर थाने के प्रभारी तक पहुंचाई जाए। मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल 2026 को होगी।
फैसले का महत्व
यह फैसला उन सभी मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां शादीशुदा व्यक्ति किसी बालिग महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि सहमति से किए गए ऐसे संबंध अपराध नहीं हैं, बशर्ते दोनों पक्ष बालिग हों और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हों।
फैसले के बाद अब इस तरह के मामलों में पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वयस्कों के अधिकारों को मजबूती देता है।

