बरेली, उत्तर प्रदेश: बॉलीवुड अभिनेत्री नुसरत भरूचा के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर में दर्शन और पूजा करने पर बरेली के मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना रजवी ने इसे “इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ बड़ा पाप” करार दिया। उन्होंने नुसरत से शरिया के अनुसार पछतावा करने, इस्तगफार पढ़ने और कलमा पढ़ने की अपील की। मौलाना का यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है और चर्चा का विषय बन गया है।
“महाकाल में पूजा करके इस्लाम का उल्लंघन किया”
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा, “नुसरत भरूचा उज्जैन के महाकाल मंदिर गईं, वहां पूजा-अर्चना की, जल चढ़ाया और हिंदू धार्मिक परंपराओं का पालन किया। इस्लाम में इन सबकी सख्त मनाही है। शरिया के नियमों के मुताबिक, उन्हें अपने इस कृत्य पर गहरा पछतावा करना चाहिए। इस्तगफार पढ़ना चाहिए और कलमा दोहराना चाहिए। उन्होंने इस्लाम के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन किया है और एक गंभीर पाप की दोषी हैं।”
मौलाना ने आगे कहा कि इस्लाम में किसी गैर-मुस्लिम धार्मिक स्थल पर पूजा करना या उसकी रस्में निभाना जायज नहीं है। नुसरत की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद यह मामला गरमाया है।
नए साल का जश्न भी बताया “नाजायज”
मौलाना रजवी ने हाल ही में एक वीडियो जारी कर मुस्लिम समाज से नए साल का जश्न न मनाने की अपील की थी। उन्होंने इसे “फिजूलखर्ची” और “यूरोपीय कल्चर” बताया। मौलाना ने कहा, “इस्लामी कैलेंडर मुहर्रम से शुरू होता है, हिंदू कैलेंडर चैत्र से। 31 दिसंबर या 1 जनवरी को जश्न मनाना शरीयत में नाजायज है। इस रात फूहड़पन, शोर-शराबा, नाच-गाना होता है, जो इस्लाम में मना है। अगर कहीं ऐसा हुआ तो उलेमा सख्ती से रोकेंगे।”
नुसरत की मंदिर यात्रा पर विवाद
नुसरत भरूचा हाल ही में उज्जैन के महाकाल मंदिर गई थीं। वहां की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। कई लोगों ने उनकी सराहना की, लेकिन एक तबका इसे गलत बता रहा है। मौलाना रजवी जैसे कुछ धार्मिक नेता इसे इस्लाम के खिलाफ मान रहे हैं।
नुसरत ने अभी इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन उनका मंदिर दर्शन करना व्यक्तिगत आस्था का मामला है या नहीं, इस पर बहस छिड़ गई है।
बरेली के मौलाना शहाबुद्दीन रजवी अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं। नए साल के जश्न और नुसरत के मंदिर दर्शन पर उनके बयान एक बार फिर सुर्खियों में हैं। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत आस्था और सामाजिक मान्यताओं की टकराहट को उजागर कर रहा है।

