चंडीगढ़: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम और साफगोई भरे फैसले में कहा है कि कोई भी परिपक्व और कानूनी रूप से शादीशुदा महिला को “शादी का वादा” देकर यौन संबंध बनाने के लिए सहमत नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में दर्ज बलात्कार और धमकी की FIR को पूरी तरह रद्द कर दिया। जस्टिस शालिनी सिंह नागपाल की एकल पीठ ने कहा कि जब एक विवाहित महिला एक साल से ज्यादा समय तक किसी अन्य पुरुष के साथ सहमति से शारीरिक संबंध बनाए रखती है, तो इसे “झूठे वादे का शिकार” नहीं माना जा सकता—यह शादी का अपमान है।
क्या था पूरा मामला?
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, मामला दो वकीलों का था। शिकायतकर्ता महिला खुद एक अधिवक्ता हैं और कानूनी रूप से विवाहित हैं। आरोपी पुरुष भी वकील है, जो उसी महिला के खिलाफ कोर्ट में केस लड़ रहा था। दोनों के बीच करीब एक साल से सहमति से शारीरिक संबंध थे। इसी दौरान आरोपी की सगाई महिला की बहन से तय हो गई। जब महिला को यह पता चला, तो उसने भावनात्मक आघात का हवाला देकर आरोपी पर बलात्कार और जान से मारने की धमकी का केस दर्ज करा दिया। उसका दावा था कि आरोपी ने उसे “शादी का वादा” देकर संबंध बनाए।
हाईकोर्ट का तर्क: “शादीशुदा महिला को झांसा देना अकल्पनीय”
कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा:
- “यह कल्पना से परे है कि कोई कानूनी रूप से विवाहित और परिपक्व महिला शादी के वादे के प्रभाव में यौन संबंधों के लिए सहमत हो सकती है।”
- “महिला एक साल से ज्यादा समय तक सहमति से संबंध बनाती रही, जबकि वह अपने पति के साथ वैध विवाह में थी। यह शादी के वादे की गलत धारणा नहीं, बल्कि वैवाहिक संस्था का अपमान है।”
- “IPC की धारा 90 (सहमति की गलत धारणा) इस मामले में लागू नहीं होती, क्योंकि महिला पूरी तरह जागरूक थी कि वह पहले से शादीशुदा है।”
- “महिला खुद वकील है और अच्छी तरह जानती है कि वह वैध विवाह में बंधी है। आरोपी भी उसी के खिलाफ कोर्ट में केस लड़ रहा था। ऐसे में वह उसे शादी का लालच दे ही नहीं सकता।”
कोर्ट ने माना कि जब महिला को अपनी बहन की सगाई का पता चला, तो भावनात्मक रूप से आहत होकर उसने बदले की भावना से केस दर्ज कराया।
धमकी के आरोप पर भी राहत
FIR में IPC की धारा 506 (आपराधिक धमकी) भी लगाई गई थी। महिला का दावा था कि जब उसने सगाई का विरोध किया, तो आरोपी ने जान से मारने की धमकी दी। कोर्ट ने कहा:
- धमकी के सटीक शब्द, तारीख और जगह का जिक्र ही नहीं है।
- बिना ठोस सबूत के सिर्फ दावे पर धारा 506 नहीं लगाई जा सकती।
कोर्ट का अंतिम फैसला
हाईकोर्ट ने पूरी FIR रद्द कर दी और कहा कि यह केस दर्ज करना ही कानून का दुरुपयोग है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति से बने संबंधों को बाद में भावनात्मक आघात या बदले की भावना से बलात्कार का केस नहीं बनाया जा सकता—खासकर जब महिला पहले से शादीशुदा और पूरी तरह जागरूक हो।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
वकीलों का कहना है कि यह फैसला उन मामलों में मिसाल बनेगा जहां विवाहित महिलाएं सहमति से संबंध बनाने के बाद “शादी का झांसा” का आरोप लगाती हैं। कोर्ट ने साफ किया कि वैवाहिक स्थिति की पूरी जानकारी होने पर IPC की धारा 376 (बलात्कार) का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। यह फैसला झूठे केसों पर अंकुश लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

