कोच्चियारा, केरल: व्यभिचार के आरोप में पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार करने वाले पति के पक्ष में केरल हाई कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने साफ कहा – “विवाहेतर संबंधों की घटनाएं आमतौर पर पूरी गोपनीयता में होती हैं। ऐसे में पति अगर परिस्थितिजन्य सबूत (circumstantial evidence) देता है, तो वही पर्याप्त माना जाएगा। फोटो, वीडियो या प्रत्यक्षदर्शी जैसे पक्के सबूत मिलना दुर्लभ होता है।”
जस्टिस कौसर ईदप्पागथ की सिंगल बेंच ने यह टिप्पणी एक मेंटनेंस केस की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि CrPC की धारा-125 के तहत गुजारा भत्ता का मामला सिविल प्रकृति का होता है और व्यभिचार साबित करने के लिए आपराधिक मामलों जैसा सख्त सबूत जरूरी नहीं।
क्या था पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एक व्यक्ति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी अलग रह रही पत्नी को हर महीने 7,500 रुपये गुजारा भत्ता देने को कहा गया था। पति का दावा था कि पत्नी लंबे समय से किसी दूसरे पुरुष के साथ रह रही है और व्यभिचार में लिप्त है, इसलिए वह मेंटनेंस की हकदार नहीं।
पति की ओर से पेश वकील ने कोर्ट में कई परिस्थितिजन्य सबूत रखे:
- पत्नी कई सालों से उसके साथ नहीं रह रही
- वह दूसरे व्यक्ति के साथ रहती है
- दोनों के व्यवहार और स्थानीय लोगों की गवाही से साफ है कि वे पति-पत्नी की तरह रह रहे हैं
कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस कौसर ईदप्पागथ ने अपने फैसले में लिखा:
“व्यभिचार जैसी बातें खुलेआम नहीं होतीं। ये पूरी सीक्रेसी में होती हैं। इसलिए यह उम्मीद करना कि पति फोटो, वीडियो या डायरेक्ट सबूत लाएगा आएगा, अव्यावहारिक है। अगर पति परिस्थितिजन्य सबूत देता है – जैसे पत्नी का लंबे समय तक अलग रहना, किसी खास व्यक्ति के साथ लगातार रहना, स्थानीय लोगों का बयान – तो यही काफी है।”
कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि पति ने व्यभिचार के पर्याप्त परिस्थितिजन्य सबूत दिए हैं। इसलिए पत्नी गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
वकीलों का कहना है कि यह फैसला मेंटनेंस के हजारों केसों में मिसाल बनेगा। अब पति को सिर्फ यह साबित करना होगा कि पत्नी किसी और के साथ पति-पत्नी की तरह रह रही है – इसके लिए होटल बुकिंग, फोटो या सीसीटीवी फुटेज जैसा ठोस सबूत जरूरी नहीं रहेगा। बस परिस्थितियां और गवाहों के बयान ही काफी होंगे।
केरल हाई कोर्ट का यह फैसला उन तमाम पतियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जो लंबे समय से अलग रह रही और कथित तौर पर किसी और के साथ रहने वाली पत्नी को गुजारा भत्ता देने को मजबूर थे।

