इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: विवाह शून्य होने तक पत्नी को मिलेगा भरण-पोषण, पारिवारिक न्यायालय का आदेश रद्द

UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि विवाह शून्य घोषित होने तक पत्नी भरण-पोषण की हकदार है। चंदौली की श्वेता जायसवाल की याचिका स्वीकार कर 2017 के पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द किया गया। श्वेता ने पति पर पहली शादी छिपाने का आरोप लगाया था। कोर्ट ने मामले को नए सिरे से विचार के लिए भेजा, बेटी का भरण-पोषण बरकरार।

Samvadika Desk
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AI जनित प्रतीकात्मक इमेज
Highlights
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट: विवाह शून्य होने तक पत्नी को भरण-पोषण का हक!
  • चंदौली की श्वेता जायसवाल की याचिका स्वीकार, 2017 का आदेश रद्द!
  • परिवार न्यायालय ने श्वेता को भरण-पोषण देने से किया था इनकार!

प्रयागराज, उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि जब तक किसी विवाह को कानूनी रूप से शून्य घोषित नहीं किया जाता, तब तक पत्नी अपने पति से भरण-पोषण पाने की हकदार बनी रहती है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने चंदौली की श्वेता जायसवाल की याचिका स्वीकार करते हुए पारिवारिक न्यायालय के 2017 के आदेश को रद्द कर दिया। मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस परिवार न्यायालय को भेजा गया है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने दिया, जो पत्नी के भरण-पोषण के अधिकारों को लेकर एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।

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मामला क्या है? चंदौली की श्वेता की कहानी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, चंदौली निवासी श्वेता जायसवाल ने अपने पति के खिलाफ परिवार न्यायालय में भरण-पोषण का दावा दायर किया था। उनकी शिकायत थी कि पति ने अपनी पहली शादी की जानकारी छिपाई थी, जिसके चलते वह अलग रह रही हैं। नवंबर 2017 में पारिवारिक न्यायालय ने इस आधार पर श्वेता को भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया कि वह स्वयं पत्नी के कर्तव्यों का पालन नहीं कर रही। कोर्ट ने कहा कि पहली शादी छिपाने के आधार पर श्वेता विवाह को शून्य घोषित करा सकती हैं, इसलिए उन्हें भरण-पोषण का हक नहीं है। हालांकि, उनकी नाबालिग बेटी के लिए 2,000 रुपये प्रति माह का भरण-पोषण तय किया गया था।

इस फैसले से असंतुष्ट श्वेता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। उनकी दलील थी कि जब तक विवाह को कानूनी रूप से शून्य घोषित नहीं किया जाता, तब तक वह पत्नी के रूप में भरण-पोषण की हकदार हैं।

हाईकोर्ट का फैसला: विवाह शून्य होने तक हक बरकरार

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पारिवारिक न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति शुक्ला ने स्पष्ट किया कि अगर विवाह को शून्य करने की डिक्री नहीं मिली है, तो वह कानूनी रूप से वैध माना जाता है। ऐसे में पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार मिलना चाहिए। कोर्ट ने परिवार न्यायालय को निर्देश दिया कि वह श्वेता के भरण-पोषण के दावे पर नए सिरे से विचार कर आदेश पारित करे। साथ ही, यह भी साफ किया कि नाबालिग बेटी को मिलने वाले 2,000 रुपये के भरण-पोषण में कोई बदलाव नहीं होगा।

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हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय को आदेश दिया कि आदेश की प्रति मिलने के बाद और दोनों पक्षों को उचित नोटिस देकर तीन महीने के भीतर मामले का निपटारा किया जाए। श्वेता की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने उनके पक्ष में राहत दी।

सामाजिक और कानूनी महत्व

यह फैसला महिलाओं के अधिकारों के लिए एक मजबूत कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार पारिवारिक विवादों में पत्नियों को भरण-पोषण से वंचित कर दिया जाता है, खासकर तब जब विवाह की वैधता पर सवाल उठते हैं। हाईकोर्ट का यह स्पष्ट रुख कि विवाह शून्य होने तक पत्नी का हक बरकरार रहता है, निचली अदालतों के लिए एक मिसाल बनेगा। यह उन महिलाओं के लिए भी राहत की खबर है, जो वैवाहिक विवादों में आर्थिक रूप से कमजोर हो जाती हैं।

चंदौली की श्वेता जायसवाल की इस कानूनी जीत ने न केवल उनके लिए न्याय का रास्ता खोला है, बल्कि यह भी दिखाया है कि कानून हर उस महिला के साथ है, जो अपने हक की लड़ाई लड़ रही है। अब सभी की नजरें परिवार न्यायालय के अगले फैसले पर टिकी हैं।

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