लखनऊ: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कोविड-19 महामारी के दौरान ड्यूटी करते हुए जान गंवाने वाले एक हेड कांस्टेबल के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को राहत न देने के फैसले पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने सरकार के मुआवजा खारिज करने वाले आदेश को निरस्त करते हुए निर्देश दिया कि दिवंगत हेड कांस्टेबल की पत्नी को आठ सप्ताह के भीतर 50 लाख रुपये की अनुग्रह राशि (एक्स-ग्रेशिया) का भुगतान किया जाए।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महामारी के दौरान आवश्यक सेवाओं में तैनात कर्मचारी भी ‘कोविड ड्यूटी’ का हिस्सा माने जाएंगे और उन्हें सरकारी नीति के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
हेड कांस्टेबल की पत्नी ने हाई कोर्ट का लिया था सहारा
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला दिवंगत हेड कांस्टेबल बलवंत प्रताप की पत्नी सेम्मा भारती की याचिका से जुड़ा है। उन्होंने राज्य सरकार के उस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें कोविड-19 से पति की मौत के बावजूद 50 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने से इनकार कर दिया गया था।
याचिका पर सुनवाई के बाद अदालत ने सरकार के निर्णय को गलत मानते हुए उसे रद्द कर दिया।
सरकार ने यह कहकर ठुकराया था दावा
राज्य सरकार का तर्क था कि बलवंत प्रताप कोविड मरीजों के इलाज या संक्रमण नियंत्रण से सीधे जुड़े कार्यों में तैनात नहीं थे। इसी आधार पर उनके परिवार को मुआवजा देने से इनकार कर दिया गया था।
हालांकि हाई कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड सरकार की इस दलील का समर्थन नहीं करते।
रिकॉर्ड से साबित हुई कोविड ड्यूटी
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस ए.के. चौधरी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) और पुलिस विभाग की ओर से जारी दस्तावेजों का हवाला दिया।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि हेड कांस्टेबल बलवंत प्रताप कोविड-19 संक्रमण की रोकथाम, नियंत्रण, लोगों को जागरूक करने और संक्रमित व्यक्तियों की सहायता जैसे कार्यों में तैनात थे। ऐसे में उन्हें कोविड ड्यूटी पर कार्यरत कर्मचारी माना जाना चाहिए।
पुलिस विभाग ने भी की थी मुआवजे की सिफारिश
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि पुलिस विभाग पहले ही बलवंत प्रताप के परिवार को एक्स-ग्रेशिया राशि देने की सिफारिश कर चुका था। इसके बावजूद राज्य सरकार ने उनका दावा खारिज कर दिया, जिसे अदालत ने उचित नहीं माना।
‘कोविड ड्यूटी’ की परिभाषा पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
फैसले में हाई कोर्ट ने ‘कोविड ड्यूटी’ की परिभाषा को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि महामारी के दौरान केवल डॉक्टर, नर्स और अस्पतालों में काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मी ही कोविड ड्यूटी पर नहीं माने जा सकते।
कोर्ट के अनुसार, पुलिस, बिजली, जलापूर्ति, दूरसंचार और अन्य आवश्यक सेवाओं में तैनात कर्मचारी भी कोविड-19 के दौरान लगातार जनता की सेवा कर रहे थे। ऐसे कर्मचारियों ने महामारी के समय व्यवस्था बनाए रखने और संक्रमण नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
ऐसे कर्मचारी भी हैं ‘कोविड वॉरियर्स’
अदालत ने कहा कि महामारी के दौरान आवश्यक सेवाओं को सुचारु रूप से चलाने वाले सरकारी कर्मचारियों को भी ‘कोविड वॉरियर्स’ के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। यदि ऐसे कर्मचारी ड्यूटी के दौरान संक्रमण की चपेट में आकर अपनी जान गंवाते हैं, तो उनके परिवार सरकारी मुआवजा नीति के तहत लाभ पाने के हकदार हैं।
कोर्ट ने माना कि दिवंगत हेड कांस्टेबल बलवंत प्रताप इस श्रेणी में स्पष्ट रूप से आते हैं।
आठ सप्ताह में 50 लाख रुपये देने का निर्देश
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के मुआवजा अस्वीकार करने वाले आदेश को निरस्त करते हुए निर्देश दिया कि सेम्मा भारती को आठ सप्ताह के भीतर 50 लाख रुपये की अनुग्रह राशि का भुगतान किया जाए।
इस फैसले को कोविड-19 महामारी के दौरान आवश्यक सेवाओं में तैनात कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि महामारी के समय सार्वजनिक सेवाओं को बनाए रखने में योगदान देने वाले कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए।

