चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सार्वजनिक भूमि के उपयोग पर धर्म के आधार पर भेदभाव को असंवैधानिक करार दिया। जस्टिस जी.आर. स्वामिनाथन ने कहा कि सरकारी मैदान किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं हो सकता। भारत धर्मनिरपेक्ष देश है और सार्वजनिक संपत्ति सभी धर्मों के लिए समान रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। कोर्ट ने तहसीलदार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ईसाई बहुल गांव में हिंदू व्यक्ति को अन्नदान करने से रोका गया था। जज ने मुस्लिम दोस्त का उदाहरण देकर सांस्कृतिक एकता की मिसाल पेश की।
सार्वजनिक मैदान पर 100 साल से ईसाई कब्जा, हिंदू को मना
हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, मामला तमिलनाडु के आथूर तालुक का है, जहां याचिकाकर्ता के. राजमणि ने कालीअम्मन मंदिर के कुंभाभिषेकम के मौके पर 3 नवंबर को सार्वजनिक मैदान में अन्नदान (भोजन वितरण) की अनुमति मांगी। मैदान पिछले 100 वर्षों से केवल ईसाई समुदाय ईस्टर जैसे आयोजनों के लिए इस्तेमाल करता आ रहा है। तहसीलदार ने 24 अक्टूबर को अनुमति देने से इनकार कर दिया और वैकल्पिक जगह सुझाई। राजमणि ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। ईसाई पक्ष ने 1912 की सहमति और 2017 की शांति बैठक का हवाला दिया, लेकिन कोर्ट ने इसे पूर्व-संवैधानिक और असंवैधानिक बताकर खारिज कर दिया।
संविधान की आत्मा का उल्लंघन: जज की सख्त टिप्पणी
जस्टिस स्वामिनाथन ने कहा कि संविधान लागू होने (26 जनवरी 1950) के बाद कोई पुरानी व्यवस्था मूल सिद्धांतों के खिलाफ नहीं चल सकती। अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर भेदभाव रोकता है। कोर्ट ने जोर दिया कि अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता देते हैं, और कानून-व्यवस्था की आशंका मात्र से धार्मिक आयोजन नहीं रोका जा सकता। अन्नदान ईस्टर के समय नहीं, बल्कि मैदान खाली होने पर था। ईस्टर पर ईसाइयों का उपयोग स्वीकार्य है, लेकिन खाली मैदान पर हिंदुओं को रोकना गलत है। जज ने कहा, “सार्वजनिक भूमि सभी के लिए या किसी के लिए नहीं।”
गांव में 2500 ईसाई, 400 हिंदू परिवार; दुखद स्थिति
कोर्ट ने गांव की जनसंख्या का जिक्र किया—2500 ईसाई और मात्र 400 हिंदू परिवार। यही वजह से प्रशासन ने कानून-व्यवस्था का हवाला दिया। जज ने इसे दुखद बताया और कहा कि धार्मिक आयोजनों में सभी की भागीदारी होनी चाहिए। उन्होंने व्यक्तिगत अनुभव साझा किया: “मेरा ईसाई मित्र क्रिसमस पर मुझे बधाई देता है, मैं पहले शुभकामना देता हूं। एक मुस्लिम दोस्त ने रमजान में मेरे लिए शाकाहारी नोंबु कांजी बनाई। यही भारत की सांस्कृतिक सुंदरता है। जब तक ऐसी एकता नहीं, शांति असंभव।”
तहसीलदार का आदेश रद्द, सभी समुदायों के अधिकार सुरक्षित
कोर्ट ने तहसीलदार का आदेश निरस्त कर अन्नदान की अनुमति दी। पहले बाइबल अध्ययन केंद्र को मंजूरी देने का हवाला देते हुए कहा कि कुंभाभिषेकम पर अन्नदान भी वैसा ही अधिकार है। प्रशासन को सभी समुदायों के अधिकारों का सम्मान करने का निर्देश दिया। यह फैसला धर्मनिरपेक्षता और सार्वजनिक संपत्ति के समान उपयोग की मजबूत मिसाल है।

