मुंबई, महाराष्ट्र: बीएमसी चुनाव में भाजपा ने इतिहास रचते हुए अकेले 89 सीटें जीतीं, जो 2002 के बाद किसी भी पार्टी की ओर से सबसे ज्यादा है। फिर भी पार्टी के अंदरूनी नेता और कार्यकर्ता इस नतीजे से उतने खुश नहीं हैं। पार्टी सूत्रों ने इसे “उम्मीदों से काफी कम” बताया है। भाजपा का लक्ष्य कम से कम 110 सीटें जीतना था, ताकि वह बहुमत (114 सीटों) के करीब पहुंच सके, लेकिन वह इस लक्ष्य से काफी पीछे रह गई। अब पार्टी में आंतरिक मंथन शुरू हो गया है कि चुनावी कैंपेन में क्या गलत हुआ।
मुख्य कारण बताए जा रहे हैं ये
पार्टी नेताओं ने कई कमजोरियां गिनाई हैं:
- मुंबई इकाई में समन्वय की कमी: मुंबई भाजपा में संगठन स्तर पर तालमेल की कमी रही। विभिन्न गुटों और नेताओं के बीच समन्वय नहीं बन पाया।
- उम्मीदवार चयन में खामी: टिकट वितरण में कई जगहों पर सही चयन नहीं हो पाया। कुछ मौजूदा पार्षदों को टिकट नहीं मिला, जिससे असंतोष फैला।
- राज-उद्धव ठाकरे का प्रभावी मुकाबला न कर पाना: राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की संयुक्त रैली ने ‘मराठी अस्मिता’ और ‘मुंबई गौरव’ के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया। शिवाजी पार्क रैली में भीड़ जुटाने में महायुति असफल रही, जिससे मराठी मतदाताओं में प्रभाव पड़ा।
- कट्टर मराठी मतदाताओं का झुकाव: विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ आए कट्टर मराठी वोटर अब ठाकरे भाइयों की ओर चले गए। यह बदलाव इतना तेज था कि शिंदे की शिवसेना भी इसे रोक नहीं पाई।
एक भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर निजी अखबार के रिपोर्टर से कहा, “हमने अन्य पार्टियों से 11 मौजूदा पार्षदों को शामिल किया था, जिससे पहले से मौजूदा पार्षदों की संख्या 93 हो गई थी। लेकिन हम उस संख्या को भी बरकरार नहीं रख पाए।”
सीएम फडणवीस की नाराजगी और शिवसेना पर तंज
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कथित तौर पर मुंबई इकाई को इस असफलता पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि पार्टी ने अपनी गति को बड़ी जीत में नहीं बदल पाया। फडणवीस ने सार्वजनिक रूप से महायुति के प्रदर्शन का बचाव किया और कहा कि गठबंधन ने 119 सीटें जीती हैं। कम से कम 14 सीटें मात्र 7 से 100 वोटों के अंतर से हारी गईं। उन्होंने राज ठाकरे और मनसे को सबसे बड़ा हारा हुआ बताया और कहा कि मुख्य लाभ उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को हुआ।
शिंदे की शिवसेना के प्रदर्शन पर भी सवाल उठे हैं। टिकट बंटवारे में तकरार जमीन पर भी दिखी। टिकट न मिलने वाले आकांक्षियों को मनाने की कोई व्यवस्था नहीं थी।
भाजपा का लक्ष्य और वास्तविकता
शुरुआत में भाजपा ने 155 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई थी। शिंदे के साथ सीट-बंटवारे की बातचीत में केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप से शिवसेना को 91 सीटें मिलीं और भाजपा को 137। लेकिन अंत में भाजपा सिर्फ 89 सीटें ही जीत पाई। पार्टी का मानना है कि मुंबई में मराठी मतदाताओं में तेज बदलाव निर्णायक साबित हुआ।
यह चुनावी नतीजा भाजपा के लिए सबक है। पार्टी अब आंतरिक समीक्षा में जुटी है ताकि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले कमजोरियां दूर की जा सकें। मुंबई में मराठी अस्मिता और स्थानीय मुद्दों पर मजबूत नैरेटिव बनाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।

