मुंबई, महाराष्ट्र: बॉम्बे हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में मेंटनेंस को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगर पत्नी खुद कमाने वाली और आर्थिक रूप से स्वतंत्र है, तो उसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम मेंटनेंस (गुजारा भत्ता) का हक नहीं है। जस्टिस मंजूषा देशपांडे की सिंगल बेंच ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने पति को बेटी के लिए 15 हजार रुपये मासिक मेंटनेंस देने का आदेश दिया।
क्या था पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला 2010 में हुई एक शादी से जुड़ा है। दंपति को 2014 में एक बेटी हुई। आपसी अनबन बढ़ने पर बैंक में नौकरी करने वाली पत्नी ने क्रूरता के आधार पर तलाक की अर्जी दी। साथ ही खुद और बेटी के लिए 25-25 हजार रुपये मासिक मेंटनेंस मांगा।
फैमिली कोर्ट ने जांच के बाद पाया कि पत्नी अच्छी सैलरी वाली नौकरी करती है और उसके पास खुद का भरण-पोषण करने के पर्याप्त साधन हैं। इसलिए उसे अंतरिम मेंटनेंस देने से इनकार कर दिया। लेकिन बेटी के लिए पति को 15 हजार रुपये मासिक देने का आदेश दिया।
पत्नी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील की। उसका कहना था कि फैमिली कोर्ट का आदेश गलत है और उसे मेंटनेंस मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की अपील?
जस्टिस मंजूषा देशपांडे ने अपील सुनते हुए कहा:
- धारा 24 के तहत अंतरिम मेंटनेंस का हक कोई “स्वतः प्राप्त” अधिकार नहीं है।
- यह तभी मिलता है जब पत्नी साबित करे कि उसके पास खुद का और बच्चों का भरण-पोषण करने के साधन नहीं हैं।
- यहां पत्नी आर्थिक रूप से स्वतंत्र है, अच्छी नौकरी करती है, इसलिए मेंटनेंस की पात्रता नहीं बनती।
- कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
हालांकि, बेटी के हित को देखते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 15 हजार रुपये मासिक मेंटनेंस के आदेश को बरकरार रखा।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
वकीलों का कहना है कि यह फैसला उन मामलों में मिसाल बनेगा जहां पत्नी खुद कमाती है और फिर भी मेंटनेंस की मांग करती है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि मेंटनेंस का उद्देश्य जरूरतमंद को सहारा देना है, न कि आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को अतिरिक्त लाभ देना।
यह फैसला महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता को भी बढ़ावा देता है, क्योंकि अब कमाने वाली पत्नी को मेंटनेंस के लिए पति पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। लेकिन बेटी-बेटों के मेंटनेंस का हक हमेशा बना रहेगा।
मुंबई में यह फैसला वैवाहिक विवादों के हजारों केसों पर असर डालेगा। कोर्ट ने एक बार फिर साबित किया कि कानून दोनों पक्षों के साथ समान न्याय करता है।

