सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: दहेज केवल हिंदुओं की नहीं, सभी धर्मों की कुप्रथा; 24 साल पुराना बरी करने का आदेश रद्द, सख्त निर्देश जारी

National News: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज को सभी धर्मों की कुप्रथा बताया, इस्लाम में मेहर को नाममात्र का करार दिया। 24 साल पुराने दहेज मौत केस में हाईकोर्ट के बरी आदेश को रद्द कर ट्रायल कोर्ट की सजा बहाल की। दहेज उन्मूलन के लिए स्कूल शिक्षा, पुलिस-जज ट्रेनिंग, जागरूकता कैंप जैसे सख्त निर्देश जारी किए।

Samvadika Desk
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Supreme Court of India (AI Generated Symbolic image)
Highlights
  • दहेज सभी धर्मों की कुप्रथा: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला!
  • 24 साल पुराना बरी आदेश रद्द, सजा बहाल!
  • स्कूलों में दहेज विरोधी शिक्षा जरूरी: कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रथा को समाज का “गंभीर अभिशाप” करार देते हुए एक बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि दहेज केवल हिंदू समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सभी धर्मों और समुदायों में फैली हुई है। इस्लामी कानून में मेहर की व्यवस्था होने के बावजूद उपमहाद्वीप की सामाजिक प्रथाओं ने इसे नाममात्र का बना दिया है और दहेज की मांग को बढ़ावा दिया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने 24 साल पुराने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक दहेज मौत के मामले में पति और सास को बरी किया गया था। ट्रायल कोर्ट की सजा बहाल करते हुए कोर्ट ने केंद्र, राज्य सरकारों, अदालतों और पुलिस को दहेज उन्मूलन के लिए व्यापक निर्देश भी जारी किए हैं।

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24 साल पुराना मामला: नसरीन की दहेज मौत

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला उत्तर प्रदेश के एक मुस्लिम दंपति से जुड़ा है। 20 साल की नसरीन की शादी अजमल बेग से हुई थी। शादी के एक साल से कुछ ज्यादा समय बाद उसकी जलकर मौत हो गई। जांच में सामने आया कि ससुराल वाले बार-बार कलर टीवी, मोटरसाइकिल और 15,000 रुपये नकद की मांग कर रहे थे। ट्रायल कोर्ट ने पति अजमल बेग और सास जमीला बेग को IPC की धारा 304बी (दहेज मौत), 498ए (क्रूरता) और दहेज निषेध अधिनियम के तहत दोषी ठहराया था।

2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों को बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि आरोपी गरीब हैं, इसलिए दहेज मांगना अविश्वसनीय लगता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को “तर्कहीन” बताते हुए खारिज कर दिया। पीठ ने कहा, “गरीबी दहेज मांगने से नहीं रोकती। दहेज निषेध अधिनियम शादी से पहले या बाद की मांग में कोई भेद नहीं करता।”

कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की सजा बहाल की। मानवीय आधार पर 94 साल की जमीला बेग को जेल न भेजने का फैसला किया, लेकिन अजमल बेग को चार हफ्ते में आत्मसमर्पण कर सजा काटने का आदेश दिया।

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दहेज सभी धर्मों में: इस्लाम में मेहर भी हो रहा खोखला

सुप्रीम कोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी दहेज के धर्म निरपेक्ष स्वरूप पर थी। पीठ ने कहा:

  • दहेज मूल रूप से बेटी की वित्तीय सुरक्षा के लिए स्वैच्छिक उपहार था, लेकिन अब यह दूल्हे की “कीमत” तय करने का माध्यम बन गया है।
  • यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और महिलाओं के सम्मान के खिलाफ है।
  • इस्लाम में मेहर दुल्हन की सुरक्षा के लिए है, लेकिन सामाजिक दबाव में नाममात्र का मेहर रखकर दहेज लिया जाता है, जिससे मेहर का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है।
  • दहेज महिलाओं के खिलाफ उत्पीड़न, क्रूरता और मौतों का बड़ा कारण है – यह सभी धर्मों में मौजूद है।

दहेज उन्मूलन के लिए सख्त निर्देश

कोर्ट ने दहेज की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए केंद्र-राज्य सरकारों, हाईकोर्ट्स और पुलिस को ये निर्देश दिए:

  • स्कूल सिलेबस में समानता और दहेज विरोधी शिक्षा शामिल करने पर विचार करें।
  • दहेज निषेध अधिकारी की सही नियुक्ति और सशक्तिकरण हो।
  • पुलिस और जजों को दहेज मामलों के सामाजिक-मनोवैज्ञानिक पहलुओं की ट्रेनिंग दी जाए।
  • हाईकोर्ट्स धारा 304बी और 498ए के लंबित मामलों का तेज निपटारा सुनिश्चित करें।
  • जिला स्तर पर जागरूकता कैंप लगाए जाएं, खासकर अनपढ़ आबादी के लिए।

कोर्ट ने फैसले की कॉपी सभी हाईकोर्ट्स और राज्य सरकारों को भेजने का आदेश दिया और अनुपालन की निगरानी के लिए केस को आगे सूचीबद्ध किया।

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यह फैसला दहेज जैसी कुरीति के खिलाफ एक मजबूत संदेश है। कोर्ट ने साफ कहा – स्वतंत्रता सिर्फ राजनीतिक नहीं, सामाजिक बुराइयों से मुक्ति भी है। क्या यह फैसला समाज में असल बदलाव लाएगा? आने वाला समय बताएगा, लेकिन कानूनी स्तर पर यह महिलाओं के हक की बड़ी जीत है।

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