फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश: शादी का मंडप सजा था। गाजे-बाजे गूंज रहे थे। जयमाला हो चुकी थी। बारातियों ने कलेवा शुरू किया ही था कि अचानक हंगामा मच गया। वजह? दूल्हा थोड़ा लंगड़ा कर चल रहा था। दुल्हन पक्ष को लगा – यह बात पहले से छिपाई गई। बस, फिर क्या था – पूरी शादी टूट गई। घंटों की मनुहार, पुलिस की मध्यस्थता, गांव के बुजुर्गों की पंचायत – कुछ भी काम न आया। आखिरकार बारात बिना दुल्हन के ही वापस लौट गई।
नवाबगंज क्षेत्र का मामला: सब कुछ पहले से तय था
आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, फर्रुखाबाद के नवाबगंज थाना क्षेत्र के एक गांव की लड़की की शादी एटा जिले के अलीगंज क्षेत्र के एक युवक से तय हुई थी। लड़का पढ़ा-लिखा था, नौकरी करता था, परिवार साधारण लेकिन सम्मानित। दोनों पक्षों में आपसी सहमति से रिश्ता पक्का हुआ। महीनों की तैयारियां हुईं। न्योते बांटे गए। गांव में शादी का उत्साह चरम पर था।
बारात तय समय पर फर्रुखाबाद पहुंची। गेस्ट हाउस में धूमधाम से स्वागत हुआ। बारातियों को खाना-पीना परोसा गया। जयमाला का रस्म पूरा हुआ। दूल्हा-दुल्हन स्टेज पर एक-दूसरे को वरमाला पहना चुके थे। हर तरफ हंसी-खुशी थी। किसी को अंदाजा भी नहीं था कि अगले कुछ मिनटों में सब कुछ उलट-पुलट हो जाएगा।
कलेवा के वक्त खुली “पोल”
जब दूल्हा कलेवा लेने स्टेज से नीचे उतरा तो लड़की पक्ष की महिलाओं की नजर उसकी चाल पर पड़ी। दूल्हा हल्का-सा लंगड़ा कर चल रहा था। पहले तो फुसफुसाहट हुई, फिर चीख-पुकार। दुल्हन की मां, मौसी, बहनें – सब एक साथ चिल्लाने लगीं:
“ये तो पहले से लंगड़ा है!”
“हमसे ये बात छिपाई गई!”
“हमारी बेटी की जिंदगी बर्बाद करने की साजिश थी क्या?”
दूल्हा पक्ष की सफाई: “ये चोट है, बीमारी नहीं”
दूल्हा पक्ष ने तुरंत सफाई दी। दूल्हे के पिता, चाचा, ताऊ सब आगे आए। बोले:
“दस-बारह दिन पहले दूल्हे को बाइक से गिरकर कूल्हे में चोट लगी थी। डॉक्टर ने कहा था – दो-तीन हफ्ते में पूरी तरह ठीक हो जाएगा। ये कोई जन्म का लंगड़ापन नहीं है।”
उन्होंने डॉक्टर का पर्चा भी दिखाने की कोशिश की। लेकिन दुल्हन पक्ष पर जैसे भूत सवार था। उनका एक ही जवाब:
“शादी से पहले बताना चाहिए था। अब हम अपनी बेटी को लंगड़े के साथ नहीं भेज सकते।”
पुलिस तक पहुंचा मामला, लेकिन फैसला नहीं बदला
विवाद बढ़ता गया। दोनों पक्षों में तीखी बहस हुई। आखिरकार मामला नवाबगंज थाने पहुंच गया। थाने में दोनों पक्षों को बुलाया गया। पुलिस ने घंटों समझाया। गांव के बुजुर्ग, रिश्तेदार – सबने मनुहार की। दूल्हा पक्ष ने कहा – “डॉक्टर से सर्टिफिकेट लाकर दे देंगे, मेडिकल करा लो।” लेकिन दुल्हन पक्ष अड़ा रहा।
अंत में दुल्हन पक्ष ने सगाई के जेवर, कपड़े सब वापस कर दिए और साफ कह दिया:
“हम अपनी बेटी की जिंदगी जोखिम में नहीं डाल सकते। शादी नहीं होगी।”
रात के 2 बज गए, बारात बिना दुल्हन लौट गई
रात के 12 बजे से शुरू हुआ विवाद रात 2 बजे तक चला। आखिरकार दूल्हा पक्ष हार मान गया। दूल्हा सजा-धजा घोड़ी पर नहीं, उदास चेहरे के साथ बस में बैठा। बारातियों का मुंह लटक गया। जो लोग सुबह खुशी-खुशी आए थे, वे रात में निराश होकर लौट गए।
गांव में चर्चा: “छोटी सी बात पर जिंदगी भर का रिश्ता टूट गया”
अगले दिन पूरे इलाके में बस एक ही चर्चा थी। कोई कह रहा था – “लड़की वालों ने जल्दबाजी की।” कोई कह रहा था – “लड़के वालों को पहले बता देना चाहिए था।” लेकिन सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि एक छोटी-सी चोट, जो कुछ दिनों में ठीक हो जाती, उसने दो परिवारों की खुशियां छीन लीं।
यह कोई पहला मामला नहीं है। आए दिन शादी के मंडप से बारात बिना दुल्हन लौटने की खबरें आती रहती हैं – कभी रंग, कभी कद, कभी नौकरी, कभी कोई और बात। लेकिन इस बार वजह थी – “लंगड़ाकर चलना”।
शायद यही आज की शादियों का सच है – जहां छोटी-सी गलतफहमी या शक भी जिंदगी भर के रिश्ते को तोड़ने के लिए काफी हो जाता है।

